बच्चे को जन्म देने का सबसे आम तरीका योनि से प्रसव है , जिसे नॉर्मल डिलीवरी भी कहते हैं ।
सिजेरियन डिलीवरी एक प्रकार की सर्जिकल डिलीवरी है , जिसमें मां के पेट और गर्भाशय के माध्यम से एक चीरा द्वारा बच्चे की डिलीवरी होती है ।
इन विट्रो फर्टिलाइजेशन और आई.यू.आई महिलाओं को गर्भवती होने में मदद करनेवाली सहायक प्रजनन तकनीक है ।
एक महिला के गर्भधारण करने और शिशु को इस दुनिया में लाने का सफ़र कई उतार - चढ़ाव से भरा होता है । जिन लोगों को गर्भधारण और प्रसव के बारे में पूरी तरह जानकारी नहीं होती , उन्हें हमेशा यह जानने की इच्छा होती है कि बच्चा कैसे पैदा होता है ! इस सवाल के जबाव कई हो सकते हैं , क्योंकि बच्चा पैदा होने की कई प्रक्रिया होती है । नॉर्मल डिलीवरी , सिजेरियन सेक्शन , आईवीएफ , आईयुआई , सरोगेसी आदि के ज़रिये बच्चा पैदा होता है । बच्चा पैदा करने की हर प्रक्रिया एक - दूसरे से अलग है और विभिन्न स्थितियों के अनुसार की जाती है । बच्चे के पैदा होने की हर प्रक्रिया अपने आप में दिलचस्प और जोखिम भरी होती है । एक बच्चे को पैदा करने के लिए माँ को कई मानसिक और शारीरिक परेशानियों से गुजरना पड़ता है । आज इस लेख में हम बच्चा कैसे पैदा होता है- इस विषय पर चर्चा करेंगे।
नॉर्मल डिलीवरी से बच्चा कैसे पैदा होता है ?
Normal Delivery se bachcha kaise paida hota hai योनि प्रसव (vaginal delivery) से बच्चा कैसे पैदा होता है यह जानना बेहद दिलचस्प हो सकता है क्योंकि यह यह प्रसव का सबसे आम तरीका है । प्रसव प्रक्रिया से बच्चा पैदा होने में तीन चरण होते हैं ।
• गर्भाशय ग्रीवा का छोटा होना और खुलना
• बच्चे का जन्म
• नाल की डिलीवरी
पहला चरण आमतौर पर 12 से 19 घंटे . दूसरा चरण 20 मिनट से दो घंटे और तीसरा चरण पांच से 30 मिनट तक रहता है ।
पहला चरण ऐंठन , पेट या पीठ दर्द से शुरू होता है जो लगभग आधे मिनट तक रहता है और हर 10 से 30 मिनट में होता है । दर्द समय के साथ बढ़ता जाता है ।
दूसरी अवस्था में , संकुचन और बच्चे को धक्के के माध्यम से जन्म देना शामिल है ।
तीसरे चरण में गर्भनाल शरीर से बाहर आती है । अधिकांश शिशुओं का जन्म पहले सिर से होता है ,
हालाँकि , लगभग 4 % मामलों में पैर या नितंब पहले बाहर आते हैं . जिन्हें ब्रीच ( breech ) के रूप में जाना जाता है इस तरह से नार्मल डिलीवरी के माध्यम से बच्चा पैदा होता है ।
जब किसी गर्भवती औरत को प्रसव पीड़ा शुरू होती है, तब से लेकर वो इसके चार स्टेज से होकर गुजरती है. जिसके बाद वो एक नई जिंदगी को इस दुनिया में लेकर आती है.
- एक्टिव लेबर
- ट्रांजिसन
- पुशिंग
- प्लेसेंटा की डिलिवरी
एक्टिव लेबर
इस दौरान जबरदस्त मरोड़ होता है, जिसकी अवधि भी ज्यादा होती है. गर्भाशय यानी यूटरस में हर घंटे एक सेंटीमीटर का खिंचाव यानी फैलाव होता है. यूटरस में चार सेंटीमीटर के खिंचाव के बाद एक्टिव लेबर की शुरुआत हो जाती है. इसी के बाद गर्भवती स्त्री को हॉस्पिटल ले जाना या फिर बच्चे के जन्म की तैयारी शुरू कर देनी होती है.
ट्रांजिसन
ज्यादातर महिलाओं के लिए बच्चे को जन्म देने का ये सबसे कठिन हिस्सा होता है. क्योंकि इस स्टेज में गर्भाशय में 10 सेंटीमीटर तक फैलाव होता है. ऐसे में गर्भवती स्त्री को यहां तक महसूस होने लगता है कि अब वो दर्द नहीं सहन कर सकती. कुछ औरतों को उल्टियां होने लगती हैं. शरीर में खासतौर पर पैरों में सिहरन सी होती है. घबराहट होती है. शुक्र है कि ये सबसे छोटा स्टेज होता है.
पुशिंग
जब गर्भाशय में पूरा फैलाव हो जाता है और बच्चे का सिर नीचे की ओर आता है, जिससे शिशु गर्भाशय से बाहर निकल सके. फिर पुश करने की जरूरत होती है. हर पुश बच्चे को थोड़ा आगे बढ़ाता है, लेकिन जैसे ही बच्चेदानी का फैलाव कम होने लगता है, बच्चा वापस पीछे सरक जाता है. मतलब यूटरस फैलता और सिकुड़ता है, ऐसे में पुश करना जरूरी होता है. जब बच्चे का सिर वजाइना के एंट्रेंस पर पहुंचता है. उस वक्त वजाइना स्किन के फैलने से जलन सी होती है. अगले करीब दो फैलाव के बाद बच्चे का सिर बाहर निकलने लगता है. एक बार जब बच्चे के कंधे बाहर निकल आते हैं तो बच्चा खुद ही बाहर की ओर सरक कर आ जाता है.
प्लेसेंटा की डिलिवरी
सिर्फ बच्चे के बाहर आ जाने से ही प्रसव प्रक्रिया पूरी नहीं होती. इसके बाद बच्चे के नाल से जुड़े प्लैसेंटा को भी यूटरस से बाहर डिलिवर करना होता है. प्लेसेंटा के जरिए ही गर्भ में पल रहे बच्चे को पोषण मिलता है.
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