विश्वकर्मा एक हिंदू भगवान हैं। विश्वकर्मा भगवान को मानने वाली आमतौर पर इसमें पाँच जातियाँ गिनी जाती हैं- 1. मिस्त्री, 2. लोहार, 3. कुम्हार, 4. सोनार और 5. मूर्तिकार। इन जातियों के लोग विश्वकर्मा को अपना अधिष्ठाता देवता मानते हैं।
विश्वकर्मा जाती क्या है ?
विश्वकर्मा एक भारतीय उपनाम है जो मूल रूप से शिल्पकारों द्वारा उपयोग किया जाता है।
विश्वकर्मा का संपर्क ब्राह्मण जाति से भी है, विश्वकर्मा पुराण के अनुसार, विश्वकर्मा जन्म से ब्राह्मण हैं अर्थात वे जन्म से ब्राह्मण थे।
इसका उपयोग कई जातियों के लोग करते हैं जैसे कि पांचाल ब्राह्मण, धीमान, लोहार, शिल्पकार, करमकर [उद्धरण वांछित] आदि और इन जातियों के लोग विश्वकर्मा को अपना पीठासीन देवता मानते हैं।
विश्वकर्मा एक हिंदू देवता हैं और उनके नाम पर विभिन्न प्रकार के शिल्प कार्य करने वाली जातियां खुद को 'विश्वकर्मा' कहती हैं।
विश्वकर्मा समाज का इतिहास
विश्वकर्मा, जो ब्रह्मांड के निर्माता हैं, आदित्य, प्रजापति, विराट पुरुष, ब्रह्मा, विष्णु आदि। ग्रंथों में संज्ञा दी गई है, इन ग्रंथों में विश्वकर्मा के पुत्रों का संबंध लोहा, लकड़ी, पत्थर, धातु आदि से है। गैर-आर्य समाज के निर्माण के आधार पर लोहार, बढ़ई। , थाथर, सुनार, शिल्पकार आदि जातियों को विश्वकर्मा का नाम दिया गया है ! वर्ष 1931 में जब तक जाति जनगणना हुई तब तक जाति स्तम्भ में विश्वकर्मा नाम नहीं था और यह लोहार बढ़ई आदि के रूप में लिखा जाता था। ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों आदि की जनगणना अलग रखी जाती थी।
देश में ब्रिटिश शासन के दौरान जब शूद्रों तक शिक्षा की किरण पहुंचने लगी तो वे सम्मान के प्रति जागरूक हो गए! जैसे-जैसे शैक्षिक चेतना विकसित हुई, वैसे ही वंचित, शोषित, पिछड़ी जातियों के लोगों ने अपने नाम के साथ सम्मानजनक उपाधियाँ लिखने के लिए, अहीरों ने यादव, चरवाहों पाल, बघेल, लोधी राजपूत, वर्मा, कोइरिया को बनाया। कुशवाहा, मौर्य, कुम्हारों ने प्रजापति, कुर्मियों ने वर्मा, चौधरी, पटेल, धोबी आर्य, कनौजिया, पासियों ने राव, खटिकों को सोनकर, कोरी ने कौलिक, कौशिक, राजभरों ने भारद्वाज, स्वच्छकारों (भंगी, सफाईकर्मी) आदि को बनाया। वाल्मीकि, कहार आदि। आदि कश्यप, कंडू ने मधेशिया, तेली साहू, गुप्ता, चमार जाटव, भास्कर, भुरजी गुप्ता, कलवर जायसवाल, हलवाई यज्ञसेनी, तमोली चौरसिया और अन्य विभिन्न जातियों ने नए उपनाम लिखना शुरू कर दिया! यह बी हाई कैंपेन का हिस्सा था! लोहार, बढ़ई आदि जातियों ने इसमें शर्मा और विश्वकर्मा उपनाम जोड़े!
आइए अब उन ग्रंथों पर एक नजर डालते हैं जिनके आधार पर विश्वकर्मा समाज खुद को भगवान से जोड़कर खुद को ब्राह्मण बनाना चाहता है, विश्वकर्मा समाज की जातियों के बारे में वे ग्रंथ क्या कहते हैं! ब्राह्मण ग्रंथों में सभी अनार्य जातियों का उद्गम वर्ण शंकर बताया गया है! विश्वकर्मा समाज की जातियों के बारे में भी यही कहा गया है!
ब्रह्मवैवत पुराण के निम्नलिखित श्लोक को देखें-
"विश्वकर्मा चा शूद्रायण विर्यधनं चक्र सा:!सूत्रधाराशचित्रकार:, स्वर्णकारस्थैव च। स्वाद ब्रह्मशपाद राजा वर्ण शंकर:"
अर्थात् जब एक शूद्र (शूद्रनारी) में विश्वकर्मा नामक देवता की कल्पना की गई, तो शिल्प करने के लिए नौ पुत्रों का जन्म हुआ, जिसमें मालाकार (माली), कर्मकार (लोहार), शंखकर, कुविन्दक (बुनकर), कुम्हार और कांस्यकार (थाथर, केसर) या तमेरा) पैदा हुए थे। छह सर्वश्रेष्ठ हैं और बाकी सूत्रधार (बढ़ई), पेंटर (चितेरा) और सुनार वर्ण शंकर हैं और ब्राह्मण शाप के कारण अशुद्ध और अविनाशी हैं।
अब यदि विश्वकर्मा समाज के लोग वास्तव में ब्राह्मण वर्ण के होते तो ब्राह्मणों द्वारा लिखी गई किसी भी पुस्तक में उनके लिए ऐसा अपमानजनक श्लोक नहीं लिखा होता। क्या उपरोक्त श्लोकों के आधार पर विश्वकर्मा को वंशज मानकर विश्वकर्मा समाज स्वयं को वर्णसंकर के रूप में स्वीकार करेगा? उपरोक्त श्लोकों में विश्वकर्मा समाज की जातियों को श्रेष्ठ और अपवित्र बताकर उन्हें बांटने का षडयंत्र रचा गया है। इन श्लोकों का सत्य से कोई मतलब नहीं है, बल्कि उच्च स्वरों की श्रेष्ठता और मेहनतकश विश्वकर्मा समाज को हीन साबित करने के लिए षडयंत्रकारी टोटके हैं। अन्यत्र शास्त्रों में विश्वकर्मा समाज की जातियों की उत्पत्ति को इस प्रकार दर्शाया गया है।
- कसेरा: ब्राह्मण पुरुष और शूद्र महिला के संपर्क से पैदा हुए बच्चों को ब्राह्मण ने कसेरा कहा है, और बर्तन बनाने को अपना पेशा बताया है।
- रथकर, महिष जाति के एक पुरुष और करण जाति की एक महिला से पैदा हुए बच्चे को रथकार यानी रथ बनाने वाला (बढ़ई) कहा जाता है।
- एक अन्य स्थान पर बढ़ई की उत्पत्ति का सम्बन्ध लकड़ी के शिल्प कौशल से यह कहते हुए कहा जाता है कि बढ़ई की उत्पत्ति एक पुरुष से पैदा हुए बच्चे और एक महिला की ब्राह्मण जाति के रूप में हुई हएक स्वर्णकार,
- एक ब्राह्मण पुरुष और एक क्षत्रिय महिला से पैदा होने वाले बच्चों के पास एक स्वर्ण कार होगी, जो सोने और अन्य धातुओं से आभूषण बनाने का पेशा करेगी।
तमेरा (तोम्बा) अयोगवा जाति के पुरुष और ब्राह्मण महिला से पैदा होने वाली संतान को ताम्रकार या कहा जाएगा। इसका पेशा तांबे आदि धातुओं से बर्तन बनाना बताया जाता है।
माली (मालाकर) महिष पुरुष और निषाद स्त्री या कामगार (लोहार) पुरुष और तेली स्त्री से पैदा होने वाले बच्चे माली कहलाएंगे जिनका व्यवसाय फूलों आदि से माला बनाना होगा।
एक ब्राह्मण पुरुष द्वारा चोरी से वैश्य स्त्री के साथ रहने से पैदा हुए बच्चे कुम्हार कहलाएंगे, जिनका काम मिट्टी से बर्तन आदि बनाना होगा।
विश्वकर्मा जाती की जनसख्या
विश्वकर्मा समाज को उनकी जनसंख्या के अनुसार सरकारी नौकरी मिले और विधानसभा व लोकसभा में भागीदारी हो. यह समाज अब उपेक्षा और अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा और अपना हक लेगा। ये बातें उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री और अखिल भारतीय विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम आसरे विश्वकर्मा ने नगर भवन में आयोजित विश्वकर्मा सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही. कहा कि पूरे देश में विश्वकर्मा समाज की आबादी साढ़े सात करोड़ है. लोहार, बढ़ई, सोनार, शिल्पकार आदि में विभाजित होने के कारण आज तक यह समाज अपनी पहचान नहीं बना पाया है।
कहा कि देश की लोकसभा और विधानसभा में विश्वकर्मा समाज का एक भी सांसद और विधायक नहीं है। . जबकि यह समाज चुनाव में अहम भूमिका निभाता है। इन समाजों को जनसंख्या के हिसाब से सभी राजनीतिक दलों को अधिकार और सम्मान देना होगा। कहा कि केंद्र सरकार पिछड़ी जातियों व विश्वकर्मा समाज की जनगणना कराकर उनके अधिकारों में भागीदारी का कार्य करे. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार ने इन समुदायों के लिए बहुत कुछ किया है। राजस्थान के बीके शर्मा ने कहा कि बालिका एवं फर्नीचर व्यवसाय पर लगने वाले जीएसटी को समाप्त करने के लिए विश्वकर्मा समाज को रोजगार के लिए आरा मशीन का लाइसेंस देना, पूर्वज कौशल विकास मिशन के युवाओं को आईटीआई प्रमाण पत्र जारी करना।
सरकार बिना किसी देरी के योजना के तहत रोजगार आरक्षण सहित अन्य मांगों को पूरा करे। इस मौके पर अखिल भारतीय विश्वकर्मा महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वेद प्रकाश शर्मा, मिथिलेश शर्मा मधुकर, सुनयन शर्मा, देवेंद्र शर्मा, प्रदेश युवा अध्यक्ष सह अखिल भारतीय बढ़ई महासभा बिहार अमित शर्मा उर्फ पप्पू, अध्यक्ष रामप्रवेश शर्मा, जिलाध्यक्ष लक्ष्मी शर्मा, सचिव अशोक शर्मा, सुजीत शर्मा, निरंजन शर्मा, प्रमोद शर्मा, अमृत राज, चंदन शर्मा, जयप्रकाश शर्मा, मनोज कुमार शर्मा समेत कई लोग मौजूद थे.
निष्कर्ष
इस पोस्ट में हमने आपको विश्वकर्मा जाती के बारे में विस्तार से बताया है तथा इसके साथ साथ आपको इस जाती के इतिहास के बारे में भी बताया है | अगर आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आया यो अपने दोस्तों को भी शेयर करे ताकि उनको भी जानकारी मिले |

