आज आपको इस आर्टिकल में राज्यसभा क्या है राज्यसभा का कार्यकाल क्या है राज्यसभा की महत्वपूर्ण शक्तियां और र राज्यसभा लोकसभा के संबंध और राज्यसभा की शक्तियां राज्यसभा का संघीय स्वरूप तथा राज्यसभा के गेरसं तत्व के बारे में विस्तार से बताया है यह पोस्ट पूरा पढ़ें
राज्यसभा क्या है?
यह एक संसद का एक अंग है। इस उच्च संदन या दित्य सदन कहा जाता है। यह सदन राज्यो का प्रतिनिधित्व करता है।
किसी भी संघीय शासन में संघीय विधायिका का ऊपरी भाग संवैधानिक बाध्यता के चलते राज्य हितों की संघीय स्तर पर रक्षा करने वाला बनाया जाता है। इसी सिद्धांत के चलते राज्य सभा का गठन हुआ है। इसी कारण राज्य सभा को सदनों की समानता के रूप में देखा जाता है
राज्यसभा का कार्यकाल
राज्य सभा के किसी निर्वाचित/ नाम-निर्देशित सदस्य का कार्यकाल छ: वर्षों का है। तथापि, किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित/ नाम-निर्देशित सदस्य अपने पूर्ववर्ती सदस्य के शेष कार्यकाल के लिए पद पर रहता है। किसी सदस्य के कार्यकाल का प्रारंभ निम्नलिखित तिथि से होता है:-
- यदि उसका निर्वाचन नियमित रिक्ति को भरने के लिए हुआ है या वह किसी नियमित या आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नाम-निर्देशित हुआ है, तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 71 के अधीन विधि और न्याय मंत्रालय (विधायी अनुभाग) द्वारा राजपत्र में उसका नाम अधिसूचित किए जाने की तारीख से; और
- यदि उसका निर्वाचन किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए हुआ है, तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 67 के अधीन विधि और न्याय मंत्रालय (विधायी अनुभाग) द्वारा उसके निर्वाचन की घोषणा के राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से।
राज्यसभा को पहली बार कब गठित किया गया था
राज्यसभा को पहली बार 3 अप्रैल 1952 को गठित किया गया था
राज्यसभा की सबसे सदस्ययो संख्या कितनी है
राज्यसभा की सबसे अधिक संख्या सदस्यों की संख्या ढाई सौ (250)है।इसमें 238 सदस्य निर्वाचित किए जाते हैं। और 12 सदस्यों को भारत के राष्ट्रपति के द्वारा नाम निर्वाचित किए जाते हैं।
राज्यसभा की महत्वपूर्ण शक्तियां
एक संघीय सदन होने के नाते, राज्य सभा को संविधान के तहत कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त हैं। राज्यसभा को तीन विशेष शक्तियां प्राप्त हैं
अनु. 249 के तहत राज्य सूची के विषय पर 1 वर्ष के लिए बिल बनाने का अधिकार
अनु. 2/3 बहुमत के साथ 312 के तहत नई अखिल भारतीय सेवा का गठन
अनु.। 67B उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा में ही लाया जा सकता है।
विधान से संबंधित सभी विषयों/क्षेत्रों को तीन सूचियों में बांटा गया है- संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। संघ और राज्य सूचियाँ परस्पर अनन्य हैं - कोई भी दूसरे के क्षेत्र में रखे गए विषय पर कानून नहीं बना सकता है। हालाँकि, यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव पारित करती है, जिसमें कहा गया है कि यह "राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन" है कि संसद, इस विषय पर कानून, संसद बन सकती है। उस संकल्प में निर्दिष्ट विषय पर भारत के पूरे या किसी हिस्से के लिए कानून बनाने का अधिकार। ऐसा संकल्प एक वर्ष की अधिकतम अवधि के लिए लागू रहेगा लेकिन इस अवधि को एक समान प्रस्ताव पारित करके एक वर्ष के लिए और बढ़ाया जा सकता है।
यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से यह घोषणा करते हुए एक प्रस्ताव पारित करती है कि संघ और राज्यों के लिए एक या एक से अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का निर्माण करना राष्ट्रीय हित में है। आवश्यक या समीचीन है, संसद को ऐसी सेवाएं सृजित करने के लिए कानून द्वारा सशक्त किया गया है।
संविधान के तहत, राष्ट्रपति के पास राष्ट्रीय आपातकाल, किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता या वित्तीय आपातकाल की स्थिति में उद्घोषणा जारी करने की शक्ति है। ऐसी हर उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर अनुमोदित किया जाना चाहिए। हालाँकि, कुछ परिस्थितियों में, राज्य सभा के पास इस संबंध में विशेष शक्तियाँ होती हैं। यदि कोई उद्घोषणा ऐसे समय की जाती है जब लोक सभा भंग हो जाती है या लोक सभा उसके अनुमोदन के लिए अनुमत अवधि के भीतर भंग कर दी जाती है और यदि उसे अनुमोदित करने वाला प्रस्ताव राज्य सभा द्वारा अनुच्छेद 352, 356 और 360 के तहत पारित किया जाता है। यदि संविधान में निर्दिष्ट अवधि के भीतर पारित किया जाता है, तो वह उद्घोषणा प्रभावी रहेगी।
राज्यसभा और लोकसभा के बीच संबंध
संविधान के अनुच्छेद 75(3) के तहत, मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका अर्थ है कि राज्य सभा सरकार नहीं बना सकती और न ही गिरा सकती है। हालाँकि, यह सरकार पर नियंत्रण कर सकता है और यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है, खासकर जब सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं होता है।
एक सामान्य विधान के मामले में, दोनों सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए, संविधान में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का प्रावधान है। वास्तव में, अतीत में तीन बार ऐसा हुआ है जब संसद के सदनों के बीच मतभेदों को सुलझाने के लिए संयुक्त रूप से मिले। संयुक्त बैठक में उठाए जाने वाले मुद्दों का निर्णय दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की कुल संख्या के बहुमत से होता है। संयुक्त बैठक संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित की जाती है जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करते हैं। हालांकि, धन विधेयक के मामले में, संविधान में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है, क्योंकि राज्यसभा की तुलना में लोकसभा को वित्तीय मामलों में प्रमुखता प्राप्त है। संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में, संविधान में प्रावधान है कि इस तरह के विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत निर्धारित विशिष्ट बहुमत से दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाना है। इसलिए संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में दोनों सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने का कोई प्रावधान नहीं है।
मंत्री संसद के किसी भी सदन से हो सकते हैं। इस संबंध में संविधान सभा विधानसभाओं के बीच कोई भेद नहीं करती है। प्रत्येक मंत्री को किसी भी विधानसभा की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, लेकिन वह उसी विधानसभा में मतदान करने का हकदार है जिसका वह सदस्य है।
इसी तरह, संसद के सदनों, उनके सदस्यों और उनकी समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के संबंध में, दोनों सदनों को संविधान द्वारा बिल्कुल समान स्तर पर रखा गया है। अन्य महत्वपूर्ण मामले जिनके संबंध में दोनों सदनों को समान अधिकार प्राप्त हैं, वे इस प्रकार हैं:- राष्ट्रपति का चुनाव और महाभियोग, उपराष्ट्रपति का चुनाव, आपातकाल की घोषणा का अनुमोदन, राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता से संबंधित उद्घोषणा राज्य और वित्तीय आपातकाल। विभिन्न संवैधानिक प्राधिकरणों आदि से रिपोर्ट और पत्र प्राप्त करने के संबंध में, दोनों सदनों को समान अधिकार हैं।
इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी के मामलों और कुछ वित्तीय मामलों को छोड़कर जो केवल लोकसभा के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, दोनों सदनों के पास समान शक्तियां हैं।
राज्य सभा का संघीय स्वरूप
1.राज्य सभा का गठन राज्य परिषद के रूप में संविधान के संघीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया गया था।
2.राज्य सभा के सदस्य मंत्रिपरिषद के सदस्य बन सकते हैं, जो संघीय स्तर पर निर्णय लेने में राज्य का प्रतिनिधित्व करेगा।
3.राष्ट्रपति के चुनाव और महाभियोग और उपराष्ट्रपति के चुनाव में समान रूप से भाग लेता है
4अनुच्छेद 249,312 राज्य सभा के संघीय स्वरूप और राज्यों के संरक्षक को भी ऊपर उठाता है।
5.इसके द्वारा सभी संविधान संशोधन विधेयक भी अलग विधानसभा और 2/3 बहुमत से पारित किए जाएंगे।
6.संसद के अनुमोदन की मांग करने वाले सभी प्रस्ताव जो आपातकाल से संबंधित हैं, उन्हें भी राज्यसभा द्वारा पारित किया जाएगा।
राज्यसभा के गैर-संघीय तत्व elements
1.केंद्र शासित प्रदेशों को राज्यसभा में भी प्रतिनिधित्व मिलता है, जो इसकी प्रकृति को गैर-संघीय बनाता है।
2.अमेरिका की तरह राज्यों की समानता के आधार पर राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं किया जाता है। वहां का हर राज्य
सीनेट में दो सीटें हैं, लेकिन भारत में सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर किया जाता है।
3.राज्यसभा में मनोनीत सदस्यों का प्रावधान है।
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निष्कर्ष
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